“शिक्षक से सब काम, पर पढ़ाने का नहीं — गैर-शैक्षिक ड्यूटियों के बोझ तले दम तोड़ती शिक्षा”
*लोगों को एक गलतफहमी है कि शिक्षक इसलिए नाराज़ है क्योंकि सरकार उससे बहुत काम करवा रही है। शिक्षक काम से नहीं थकता। वह तो सदियों से कम वेतन, कम संसाधन और ज़्यादा उम्मीदों में काम करता आया है।*
36 एप्लिकेशन चलानी हों—शिक्षक चला लेता है। ऑनलाइन रिपोर्ट, पोर्टल, डेटा— शिक्षक भर देता है। बीएलओ की ड्यूटी लोकतंत्र के नाम पर निभा देता है। कुत्ते गिनने की ड्यूटी— वह भी निभा लेता है, क्योंकि आजकल इंसानों से ज़्यादा सरकारी अहमियत कुत्तों की है।
शिक्षक इन सब से परेशान नहीं है। वह इसलिए परेशान है क्योंकि— 👉 इन सबके बीच बच्चे छूट जा रहे हैं। शिक्षक जानता है कि शिक्षा कोई ऐप नहीं, जिसे अपडेट कर दिया जाए। शिक्षा कोई सर्वे नहीं, जिसे दो दिन में निपटा दिया जाए। शिक्षा रोज़ चाहती है— ध्यान, समय, ऊर्जा और संवाद।
लेकिन सरकार ने शिक्षक को कक्षा से उठाकर हर उस जगह खड़ा कर दिया जहाँ पढ़ाई का दूर–दूर तक रिश्ता नहीं। और फिर आश्चर्य होता है— “बच्चों का स्तर क्यों गिर रहा है?”
जब शिक्षक क्लास में कम और पोर्टल में ज़्यादा रहेगा, तो ज्ञान नहीं, डेटा पैदा होगा। आज शिक्षा नहीं बिगड़ रही,👉 उसे बिगाड़ा जा रहा है।
सबसे बड़ा व्यंग्य देखिए—शिक्षा की दुर्दशा के लिए उसी शिक्षक को दोष दिया जा रहा है जिससे शिक्षण का अधिकार छीना जा रहा है। लोग कहते हैं— “सरकार तो शिक्षकों से खूब काम ले रही है।”
हाँ, सरकार ने शिक्षक से सब काम लिया— 👉 सिवाय पढ़ाने के। और यही बात शिक्षक को रातों में जगाती है, क्योंकि वह जानता है— ऐप से आंकड़े बनते हैं, सर्वे से रिपोर्ट बनती है, लेकिन 👉 देश बच्चों से बनता है। और जब शिक्षक बच्चों के पास नहीं होगा, तो भविष्य किसी पोर्टल पर अपलोड नहीं होगा।
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