लखनऊ।
अखिल भारतीय शिक्षक संघर्ष मोर्चा ने परिषदीय विद्यालयों में 2011 से पहले नियुक्त शिक्षकों पर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता के मुद्दे पर केंद्र सरकार से शीघ्र निर्णय लेने की मांग की है। मोर्चा का कहना है कि इस विषय पर लंबे समय से असमंजस बना हुआ है, जिससे देशभर के शिक्षक नाराज और निराश हैं।
मोर्चा के नेतृत्व में 22 राज्यों के शिक्षक संगठनों ने केंद्र सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित किया है। इसके तहत दिल्ली में 24 नवंबर को प्रदर्शन भी किया गया था, लेकिन इसके एक महीने बाद भी केंद्र सरकार की ओर से कोई स्पष्ट निर्णय सामने नहीं आया है।
शिक्षक संघों का कहना है कि टीईटी से जुड़े फैसले में देरी के कारण लाखों शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश के शिक्षक भी शामिल हैं। लंबे समय से शिक्षक यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि केंद्र सरकार इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए कोई ठोस कदम उठाएगी।
संघर्ष मोर्चा के राष्ट्रीय सह-संयोजक अनिल यादव ने कहा कि एनसीटीई के फैसले से शिक्षकों की परेशानी और बढ़ गई है। शिक्षकों को आशा थी कि केंद्र सरकार इस संकट को समझेगी और अध्यादेश लाकर उन्हें टीईटी से मुक्त करेगी, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई न होने से शिक्षकों में गहरी निराशा है।
मोर्चा ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। शिक्षकों का कहना है कि सेवा में रहते हुए नए नियम थोपना न्यायसंगत नहीं है और इस पर तत्काल समाधान निकलना चाहिए।
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