सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम फैसले में ‘मासिक धर्म स्वास्थ्य’ को मौलिक अधिकार करार दिया। साथ ही देश के सभी स्कूलों (चाहे सरकारी हों या निजी) में कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
शीर्ष कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को किशोरियों के लिए सभी स्कूलों में केंद्र की राष्ट्रीय नीति यानी ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को लागू करने के निर्देश दिए। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ नेे 126 पन्नों के फैसले में कहा, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार और जीवन के अधिकार का हिस्सा है। पीठ ने सभी स्कूलों में किशोरियों को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन देनेे का आदेश दिया। कोर्ट ने 2022 में जया ठाकुर की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर यह फैसला सुनाया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता शिखा बग्गा ने कहा कि इस फैसले का असर सिर्फ छात्राओं तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि दफ्तरों में महिलाकर्मियों तक पहुंचेगा। अब वहां माहवारी अवकाश की मांग बढ़ेगी।
सभी स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड मिलें
● शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी स्कूलों में गुणवत्ता युक्त सैनिटरी नैपकिन मुफ्त में उपलब्ध कराए जाएं
● सैनिटरी नैपकिन शौचालय परिसर में वेंडिंग मशीनों या किसी अन्य माध्यम से आसानी से उपलब्ध हों
● स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन कॉर्नर बनाया जाए, जहां आपात स्थिति के लिए जरूरी सामान हो
● सभी स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय हों, जिनमें हर समय पानी उपलब्ध हो
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल देशभर में सभी सरकारी और निजी संस्थानों में काम करने वाली महिलाकर्मियों के लिए माहवारी अवकाश देने पर केंद्र से नीति बनाने को कहा था।
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