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लाखों की सैलरी के बावजूद विदेशों में नौकरी से कतरा रहे युवा, जर्मनी-जापान में रुचि कम

लखनऊ। जर्मनी और जापान जैसे विकसित देशों में स्वास्थ्य क्षेत्र की नौकरियों के लिए लाखों रुपये मासिक वेतन की पेशकश के बावजूद प्रदेश के युवाओं का रुझान अपेक्षाकृत कम देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आकर्षक वेतन के पीछे छिपी जटिल प्रक्रियाएं और सामाजिक कारण युवाओं को विदेश जाने से रोक रहे हैं।

सेवायोजन विभाग द्वारा जर्मनी में नर्सिंग और जापान में केयरगिवर पदों के लिए कुल 200 रिक्तियों के आवेदन आमंत्रित किए गए थे, लेकिन अब तक 50 से भी कम युवाओं ने रुचि दिखाई है। यह स्थिति तब है जब जर्मनी में नर्सिंग पद के लिए लगभग 2.29 लाख रुपये प्रतिमाह और जापान में केयरगिवर पद के लिए 1.17 लाख रुपये मासिक वेतन तय किया गया है।

जटिल प्रक्रिया बनी सबसे बड़ी बाधा

विशेषज्ञों के अनुसार, ऊंचे वेतन के बावजूद भाषा और लाइसेंस से जुड़ी शर्तें युवाओं को पीछे हटा रही हैं। जर्मनी में नर्सिंग के लिए जर्मन भाषा में B1 या B2 स्तर की अनिवार्यता है, जबकि जापान में जापानी भाषा का प्रशिक्षण जरूरी है। इसके साथ ही डिग्री सत्यापन, स्थानीय लाइसेंस परीक्षा और लंबी चयन प्रक्रिया भी युवाओं में असमंजस पैदा कर रही है।

सामाजिक और पारिवारिक कारण भी जिम्मेदार

लंबे समय तक परिवार से दूर रहना, अलग कार्य संस्कृति और सख्त अनुशासन भी युवाओं की चिंता का कारण बन रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में पहले से मौजूद मानसिक और शारीरिक दबाव के चलते कई युवा विदेश जाकर काम करने से बच रहे हैं।

भारत में भी उपलब्ध हैं बेहतर अवसर

विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में देश के कई राज्यों में नर्सिंग और मेडिकल स्टाफ के लिए बेहतर वेतन और स्थिर नौकरियों के विकल्प उपलब्ध हैं। इसके अलावा विदेशों में भारी टैक्स कटौती और महंगे जीवन-यापन के बाद वास्तविक बचत उतनी आकर्षक नहीं रह जाती, जितनी कागजों पर नजर आती है।

इजराइल और खाड़ी देशों की ओर झुकाव

इसके विपरीत, इजराइल और खाड़ी देशों में भाषा की बाधा कम, प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और जॉइनिंग जल्द होने के कारण युवा वहां काम करने में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं।

मार्गदर्शन से बदलेगा रुझान

सेवायोजन विभाग का कहना है कि रोजगार संगम पोर्टल के माध्यम से भर्ती प्रक्रिया जारी है। युवाओं को सही जानकारी, काउंसलिंग और भरोसेमंद मार्गदर्शन उपलब्ध कराकर उनकी शंकाएं दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक जमीनी स्तर पर सहायता और भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक लाखों की सैलरी भी युवाओं को परदेस की नौकरी के लिए आकर्षित नहीं कर पाएगी।

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