प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पदोन्नत (प्रोन्नत) अधिकारियों का वेतन किसी भी स्थिति में उनके जूनियर अधिकारियों से कम नहीं हो सकता। कोर्ट ने सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी बादल चटर्जी को बड़ी राहत देते हुए केंद्र और राज्य सरकार को उनके बकाया वेतन का भुगतान ब्याज सहित करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि प्रोबेशन अवधि के दौरान भी पीसीएस से आईएएस में पदोन्नत अधिकारियों को उनके जूनियर अधिकारियों से कम वेतन देना नियमों के खिलाफ है। न्यायालय ने भारत सरकार के 31 अक्टूबर 1966 के निर्णय और 1994 के कार्यालय ज्ञापन का हवाला देते हुए कहा कि वरिष्ठ अधिकारी का वेतन हमेशा कनिष्ठ से अधिक या कम से कम बराबर होना चाहिए।
मामले के अनुसार, बादल चटर्जी को वर्ष 2012 में आईएएस कैडर में पदोन्नति मिली थी। प्रोबेशन अवधि के दौरान उनकी मूल सेवा पीसीएस पर ही रखी गई, जबकि जून 2013 में पीसीएस में ही बने उनके जूनियर अधिकारियों को 67,000 से 79,000 रुपये के उच्च वेतनमान का लाभ दिया गया। यह लाभ बादल चटर्जी को नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में याचिका दाखिल की, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने कैट के फैसले को निरस्त करते हुए आदेश दिया कि 20 जून 2013 से वेतन अंतर की बकाया राशि, संशोधित सेवा निवृत्ति लाभ और पेंशन का भुगतान किया जाए। साथ ही बकाया राशि पर छह प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया दो माह के भीतर पूरी की जाए।
इस फैसले को प्रशासनिक सेवा में कार्यरत और सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है, जिससे वेतन विसंगतियों से जुड़े मामलों में भविष्य में मार्गदर्शन मिलेगा।
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