इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि तदर्थ और कार्यवाहक प्रधानाचार्यों को प्रधानाचार्य पद का वेतन देय नहीं है क्योंकि नए अधिनियम में कोई प्रावधान नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि 1982 के अधिनियम की धारा 18 में उल्लिखित पूर्व-शर्तों का पालन किया जाना अनिवार्य है। उन शर्तों के पूरा होने के बाद ही ऐसा तदर्थ पदोन्नत व्यक्ति प्रधानाचार्य के पद के वेतन का हकदार होगा। यह भी कहा कि पहले नियुक्त तदर्थ प्रधानाचार्यों से वेतन की वापसी न की जाए और इस आदेश की तिथि के बाद उन्हें भी प्रधानाचार्य पद का वेतन न दिया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने इस मुद्दे को लेकर समिता सहित कई अन्य की याचिकाओं पर उठे कानूनी प्रश्न और संदर्भ का निस्तारण करते हुए दिया है। कोर्ट के समक्ष तीन कानूनी प्रश्न थे। जिनका कोर्ट ने सुनवाई करते हुए निस्तारण कर दिया।
सभी याचिकाएं निरस्त
कोर्ट ने याचिकाएं निस्तारित करते हुए निर्देश दिया कि संबंधित डीआईओएस हर मामले के तथ्य जांचेंगे। कोर्ट ने आगे कहा कि यदि रिक्ति अधिसूचित नहीं की गई थी तो ऐसा तदर्थ प्रधानाचार्य उस पद के वेतन का हकदार नहीं होगा। ऐसे मामले में कॉलेज इस निर्णय की तिथि से चार सप्ताह के भीतर रिक्ति को अधिसूचित करेगा।
नए नियम लागू: कोर्ट
कोर्ट ने कहा कि अब उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन नियमावली 2023 लागू हो गई है और 1982 का अधिनियम निरस्त कर दिया गया है। 2023 के अधिनियम में तदर्थ प्रधानाचार्यों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। 1921 के अधिनियम और उसके नियमों के तहत तदर्थ प्रधानाचार्य को वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं है इसलिए इसके कानूनी परिणाम लागू होंगे।
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