*🛑 क्या नियुक्ति के बाद नियम बदलना न्याय है?*
पूर्व-नियुक्त शिक्षकों पर TET की अनिवार्यता: एक संवैधानिक प्रश्न
एक बुनियादी सवाल जो आज हर किसी के मन में है—
क्या खेल शुरू हो जाने के बाद उसके नियम बदलना सही है?
🛑 टीईटी (TET) के मुद्दे पर जो स्थिति बनी है, वह समझ से परे है। किसी भी कानून या नियम को ‘बैकडेट’ यानी पिछली तारीख से लागू करना (Retrospective Effect) सामान्य समझ और न्याय के सिद्धांत, दोनों के खिलाफ लगता है।
1. भविष्य के लिए होते हैं कानून, भूतकाल के लिए नहीं
भारतीय संविधान की मूल भावना यही है कि कानून हमेशा भविष्य के लिए बनाए जाते हैं। संविधान का अनुच्छेद 20(1), जो भले ही आपराधिक मामलों से जुड़ा हो, लेकिन एक बड़ा संदेश देता है—सरकार किसी नागरिक को उन नियमों के आधार पर दंडित नहीं कर सकती जो उस वक्त अस्तित्व में ही नहीं थे, जब उसने वह कार्य (या नौकरी) शुरू की थी।
2. भरोसे का क्या होगा?
जब इन शिक्षकों की भर्ती हुई थी, तब उन्होंने राज्य सरकार द्वारा तय किए गए सभी मापदंडों को पूरा किया था। उन्होंने सरकार की व्यवस्था पर भरोसा किया और सेवा में आए। आज वर्षों बाद, नए नियम बनाकर यह कहना कि “आप अब अयोग्य हैं,” सरकार और नागरिक के बीच के भरोसे को तोड़ने जैसा है। इसे संवैधानिक नैतिकता कैसे माना जा सकता है?
3. गलती प्रशासन की, सज़ा शिक्षक को क्यों?
सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है और हम सभी उनके फैसले का सम्मान करते हैं। लेकिन लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखना और संविधान की आत्मा को टटोलना हमारा अधिकार है। यहाँ सवाल योग्यता का नहीं, बल्कि ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) का है। यदि नियुक्ति के समय नियमों में कोई कमी रह गई थी या नीतियां स्पष्ट नहीं थीं, तो यह प्रशासनिक भूल है। राज्य अपनी प्रशासनिक चूक की सज़ा शिक्षकों को उनकी नौकरी खतरे में डालकर नहीं दे सकता।
4. अभी भी उम्मीद बाकी है
ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने अदालत में अपना पक्ष उतनी मजबूती से नहीं रखा, जितनी जरूरत थी। लेकिन उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है। देश की संसद और विधानसभाओं (व्यवस्थापिका) के पास व्यापक अधिकार हैं। सरकार चाहे तो कानून बनाकर या विशेष प्रावधान के जरिए कार्यरत शिक्षकों को राहत दे सकती है।
अंत में, बात सिर्फ कानून की नहीं, मानवीयता और न्याय की है। आशा है कि शिक्षकों के हित में एक सकारात्मक फैसला जल्द ही आएगा।
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धन्यवाद।
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