सिफारिशों के बाद भी नहीं हुआ बदलाव
याचिका में कहा गया कि 16वीं लोकसभा की लोक लेखा समिति ने और ईपीएफओ की सब-कमेटी (2022), दोनों ने वेतन सीमा में समय-समय पर और सही बदलाव की सिफारिश की है, लेकिन जुलाई 2022 में सेंट्रल बोर्ड से मंजूरी मिलने के बावजूद, केंद्र सरकार ने इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की। याचिका में कहा गया है कि पिछले 70 सालों में वेतन सीमा बदलाव किसी भी पैमाने के हिसाब से लगातार नहीं हुआ।
नई दिल्ली, विशेष संवाददाता। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) योजना के लिए वेतन सीमा बढ़ाने पर चार माह में फैसला करने को कहा है। केंद्र को यह आदेश तब दिया गया जब कोर्ट को बताया गया कि ईपीएफओ के लिए वेतन सीमा में 11 सालों से कोई बदलाव नहीं हुआ है।
सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल की याचिका का निपटारा करते हुए जस्टिस जेके माहेश्वरी और एएस चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश दिया। याचिका में दावा किया गया था ईपीएफओ उन लोगों को कवरेज से बाहर रखता है, जिनका मासिक वेतन 15000 रुपये अधिक है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने पीठ से कहा कि केंद्र और कई राज्य सरकार द्वारा तय न्यूनतम वेतन ईपीएपओ की 15000 रुपये प्रति महीने की वेतन सीमा से अधिक है।
अधिवक्ताओं ने कहा, इसकी वजह से अधिकांश कर्मचारी ईपीएफओ स्कीम के फायदों और सुरक्षा से वंचित रह गए हैं।
उन्होंने पीठ से कहा कि सरकार ने वेतन सीमा में अनियमित रूप से बदलाव किया है। कभी-कभी 13-14 साल बाद बिना तय समयसीमा या महंगाई, न्यूनतम वेतन, प्रति व्यक्ति आय जैसे संकेतकों पर विचार किए बगैर किया है। याचिका में कहा गया कि श्रमबल के बड़े हिस्से को इससे बाहर कर दिया गया है, जो संगठित क्षेत्र में कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा देने के मकसद के खिलाफ है।
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